दिल्ली में वायु प्रदूषण एक लंबे समय से चली आ रही गंभीर समस्या है। सर्दियों के आते ही राजधानी की हवा ज़हर बन जाती है और इससे हर साल लाखों लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। हालांकि कई योजनाएं और अभियानों की शुरुआत की गई है, फिर भी प्रदूषण का स्तर सुधरने की बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है।
2025 की शुरुआत के साथ ही इस मुद्दे पर एक बार फिर ध्यान केंद्रित हुआ है, जब नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर एक रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट न केवल मौजूदा हालात की स्थिति को दर्शाती है, बल्कि उन खामियों की भी ओर इशारा करती है जो विभिन्न सरकारी एजेंसियों की तरफ से हुई हैं।
यह लेख CAG की इस रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली में वायु प्रदूषण की वास्तविक स्थिति, सरकारी एजेंसियों की कमज़ोरियों और वायु गुणवत्ता पर इसके प्रभावों की विस्तृत जानकारी देता है। साथ ही, इसमें कुछ संभावित उपायों की भी चर्चा की गई है जो भविष्य में इस संकट से निपटने में मदद कर सकते हैं।
CAG रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने दिल्ली सरकार और संबंधित एजेंसियों के उन दावों को कठघरे में खड़ा कर दिया है जो प्रदूषण नियंत्रण को लेकर किए जा रहे प्रयासों की बात करते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, कई स्तरों पर गंभीर चूक हुई है, जिससे वायु प्रदूषण की स्थिति लगातार बदतर होती चली गई।
1. प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUC) में लापरवाही
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2018-21 के बीच 1.08 लाख से अधिक वाहनों को ऐसे समय में PUC प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए जब वे वाहन निर्धारित मानकों से अधिक कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन का उत्सर्जन कर रहे थे। कुछ मामलों में, एक ही मिनट के अंदर एक वाहन को कई बार प्रमाणपत्र जारी किया गया, जो सिस्टम में गड़बड़ी की ओर इशारा करता है।
2. वायु गुणवत्ता निगरानी प्रणाली में कमियां
दिल्ली में वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए जो CAAQMS (Continuous Ambient Air Quality Monitoring Stations) लगाए गए हैं, वे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मानकों के अनुरूप नहीं हैं। इससे एक बड़ी समस्या यह सामने आई कि कई बार प्रदूषण के असल आंकड़े रिपोर्ट नहीं हो पाए, जिससे सरकार की ओर से प्रभावी कार्रवाई करना मुश्किल हो गया।
3. पुराने वाहनों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने में सुस्ती
CAG रिपोर्ट बताती है कि 2018 से 2021 तक कुल 47.51 लाख पुराने वाहनों की पहचान की गई थी, जिनमें से केवल 2.98 लाख का ही डीरजिस्ट्रेशन हुआ। बाकी सभी वाहन या तो सड़कों पर चलते रहे या फिर बिना किसी रिकॉर्ड के मौजूद हैं।
4. परिवहन विभाग की सीमित क्षमता
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि परिवहन विभाग के पास न तो पर्याप्त स्टाफ है और न ही ऐसे वाहन हैं जिनसे सड़कों पर चल रहे वाहनों की प्रदूषण जांच की जा सके। इसका सीधा असर प्रदूषण नियंत्रण पर पड़ता है क्योंकि नियमों के उल्लंघन पर समय रहते कार्रवाई नहीं हो पाती।
5. अंतरराज्यीय बस टर्मिनल (ISBT) के निर्माण में देरी
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद द्वारका और नरेला में ISBTs का निर्माण अब तक शुरू नहीं हुआ है। इससे दिल्ली में बसों के ट्रैफिक का दबाव बढ़ता है और प्रदूषण का स्तर और खराब हो जाता है।
Hindustan Times के अनुसार, यह रिपोर्ट दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण की रणनीतियों और उनके अमल में गंभीर खामियों की ओर इशारा करती है।
वायु गुणवत्ता पर प्रभाव और वर्तमान स्थिति

दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) हर साल सर्दियों में खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है। हाल ही में आए आंकड़े बताते हैं कि शहर में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब होती जा रही है और इससे खासकर बच्चों, बुज़ुर्गों और फेफड़े संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों पर सबसे बुरा असर पड़ता है।
CAG रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि निगरानी प्रणाली में मौजूद खामियों के कारण असली प्रदूषण स्तर की जानकारी सही ढंग से सामने नहीं आ पाती। जब AQI आंकड़े वास्तविक स्थिति को ठीक से न दर्शाएं, तो नीतियों और निर्णयों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए, कई बार जब स्थिति आपातकालीन होती है, तब तक सरकार को पता ही नहीं चलता कि एक्शन लेना जरूरी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि दिल्ली की हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 कणों की मात्रा न केवल अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों को जन्म देती है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से फेफड़ों और हृदय को भी नुकसान पहुंचाती है।
इसके अलावा, खुले में कूड़ा जलाना, निर्माण स्थलों पर धूल का उड़ना, औद्योगिक गतिविधियां और पराली जलाने की घटनाएं हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले मुख्य कारण हैं।
बड़े पैमाने पर निजी वाहनों का उपयोग और सार्वजनिक परिवहन की सीमित पहुंच भी इस संकट को और बढ़ावा देती है। हालांकि सरकार ने कई योजनाएं लागू की हैं, लेकिन जब तक निगरानी प्रणाली सटीक नहीं होगी और आंकड़ों की पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी, तब तक सही दिशा में ठोस निर्णय लेना मुश्किल रहेगा।
एजेंसियों की भूमिका और ज़िम्मेदारियाँ
दिल्ली में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की ज़िम्मेदारी कई सरकारी एजेंसियों और विभागों पर होती है। इनमें दिल्ली सरकार, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC), परिवहन विभाग, नगर निगम, दिल्ली ट्रैफिक पुलिस और केंद्र सरकार की पर्यावरण मंत्रालय जैसी संस्थाएं शामिल हैं।
हालांकि, CAG की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि इन एजेंसियों के बीच समन्वय की गंभीर कमी है और कई बार ज़िम्मेदारियाँ तय होने के बावजूद उन पर कार्रवाई नहीं होती।
1. DPCC की कार्यप्रणाली:
DPCC का मुख्य काम दिल्ली में पर्यावरण से जुड़े सभी नियमों का पालन कराना है, लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि यह संस्था पर्याप्त निगरानी नहीं कर पाई। उदाहरण के लिए, कई निर्माण स्थलों पर प्रदूषण फैलाने वाले काम होते रहे, लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
2. परिवहन विभाग की लापरवाही:
वाहनों की जांच, पुराने वाहनों का रजिस्ट्रेशन रद्द करना और प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्रों की निगरानी करना इस विभाग की ज़िम्मेदारी है। लेकिन विभाग ने 47 लाख पुराने वाहनों में से केवल 3 लाख का ही डीरजिस्ट्रेशन किया। इससे बाकी लाखों वाहन बिना मानकों के सड़कों पर चलते रहे।
3. नगर निगम की सुस्ती:
नगर निगम की ज़िम्मेदारी है कि वह कचरा प्रबंधन, सड़क की सफाई और खुले में कूड़ा जलाने जैसी गतिविधियों को रोके। लेकिन ज़मीनी स्तर पर ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां कार्रवाई नहीं की गई।
4. समन्वय की कमी:
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि विभिन्न विभागों के बीच डेटा साझा करने और संयुक्त अभियान चलाने में भी बड़ी लापरवाही हुई है। इससे प्रदूषण को कम करने की कोशिशें टुकड़ों में बंटी रहीं और उनका असर नहीं हो पाया।
इन सभी तथ्यों से यह साफ होता है कि अगर एजेंसियां आपस में बेहतर तालमेल से काम करतीं और नियमों का सख्ती से पालन करातीं, तो वायु प्रदूषण की स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता था।
समाधान और सुझाव: भविष्य की राह
दिल्ली में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए अब सिर्फ योजनाएं बनाना काफी नहीं होगा, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की सख्त ज़रूरत है। नीचे कुछ ऐसे महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं जिन्हें लागू करके प्रदूषण की समस्या को काबू में लाया जा सकता है:
1. निगरानी प्रणाली को मजबूत बनाना:
CAAQMS जैसे निगरानी केंद्रों को अपग्रेड किया जाए और उनके डेटा को रियल-टाइम में सार्वजनिक किया जाए, जिससे सरकार और आम जनता दोनों जागरूक हो सकें। इससे नीतियों का असर जल्द दिखने लगेगा।
2. पुराने वाहनों को हटाना:
दिल्ली की सड़कों पर चल रहे 10 साल से पुराने डीजल और 15 साल से पुराने पेट्रोल वाहनों को सख्ती से हटाना जरूरी है। साथ ही, ई-वाहनों और CNG वाहनों को बढ़ावा देने की नीति अपनाई जाए।
3. सार्वजनिक परिवहन का विस्तार:
मेट्रो, बस और इलेक्ट्रिक रिक्शा जैसे सार्वजनिक साधनों को अधिक सुलभ और सुरक्षित बनाना होगा, ताकि लोग निजी वाहनों का कम उपयोग करें।
इसके साथ ही, दिल्ली जैसे शहरों में नई टैक्सी सेवाओं की शुरुआत से भी सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे निजी वाहनों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
4. निर्माण स्थलों की निगरानी:
निर्माण स्थलों पर धूल को नियंत्रित करने के लिए ऑटोमैटिक पानी छिड़काव प्रणाली, धूल रोधी जाल और कवरिंग सिस्टम अनिवार्य किए जाएं।
5. पराली जलाने पर वैकल्पिक उपाय:
पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के समाधान के तौर पर किसानों को उचित मशीनें और आर्थिक सहायता दी जाए ताकि वे अन्य विकल्प अपनाएं। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर काम करना होगा।
6. जन-जागरूकता अभियान:
लोगों में प्रदूषण के प्रभाव और इससे बचाव के बारे में जागरूकता फैलाना भी बेहद जरूरी है। स्कूलों, कॉलोनियों और सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।
इन सभी उपायों का उद्देश्य केवल वायु गुणवत्ता सुधारना ही नहीं है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाना भी है।
निष्कर्ष
दिल्ली की हवा में घुलता ज़हर अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा—यह अब स्वास्थ्य, नीतियों की पारदर्शिता और समाज की चेतना का सवाल बन चुका है। CAG की रिपोर्ट एक कड़वा सच सामने लाती है: योजनाएं बनीं, बजट जारी हुआ, एजेंसियां गठित हुईं, लेकिन ज़मीन पर नतीजे बेहद कम दिखे।
हमें अब इस मुद्दे को केवल सर्दियों में चर्चा का विषय बनाकर नहीं छोड़ देना चाहिए। वायु प्रदूषण 12 महीने सक्रिय रहने वाला खतरा है, और इसका समाधान भी 12 महीने के निरंतर प्रयास से ही निकल सकता है।
दिल्ली जैसे शहर के लिए यह बहुत शर्मनाक स्थिति है कि हम साल 2025 में भी “सांस लेने” जैसे बुनियादी अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सरकार को चाहिए कि वह न सिर्फ नीति बनाए, बल्कि जवाबदेही तय करे। और नागरिकों को चाहिए कि वे सवाल करें, भागीदारी निभाएं और जिम्मेदारी लें।
Disclaimer: इस लेख में प्रस्तुत जानकारी नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट तथा विभिन्न समाचार स्रोतों पर आधारित है। लेख का उद्देश्य जागरूकता फैलाना और वायु प्रदूषण से जुड़ी सरकारी कार्रवाइयों की समीक्षा करना है। इसमें दी गई राय लेखक की है और इसका उद्देश्य किसी संस्था या व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं है। कृपया किसी भी निर्णय से पहले संबंधित विभागों या विशेषज्ञों से सलाह अवश्य लें।